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ग़ज़ल
आइना है माने-ए-नज़्ज़ारा-ए-हुस्न-ओ-जमाल
हो सके तो सद्द-ए-अस्कन्दर को ऐ दिलदार तोड़
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
हुआ है अबरू-ए-जानाँ से दिल-ए-बेताब सद-पारा
मुक़ाबिल हो नहीं सकता दम-ए-शमशीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
नज़'अ में आए हैं सद अफ़सोस जीते-जी न आए
वो हैं आने को तो अब तय्यार हैं जाने को हम
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
यहाँ अब सई-ए-अस्कंदर की कैसे दाद दी जाए
कि हम तो देख कर आईना हैरानी में आते हैं
शहाबुद्दीन साक़िब
ग़ज़ल
जम ओ अस्कंदर ओ दारा ओ कैकाऊस ओ केख़ुसरौ
कोई इस ढब के दिल बादल बना सकता है क्या क़ुदरत
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
देखिए ज़ौक़-ए-सफ़ा-केशी का हो अंजाम क्या
क़िस्मत-ए-आईना 'मुस्लिम' दस्त-ए-अस्कंदर में है
मुस्लिम मलेगाँवी
ग़ज़ल
दर्द-ए-दिल में नहीं जाती सुख़न-आराई पेश
काश ये क़िस्सा-ए-असकंदर-ओ-दारा होता
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
कुछ वहम सद्द-ए-राह-ए-सितम था कि वक़्त-ए-ज़ब्ह
मेरे गुलू पे ख़ंजर-ए-क़ातिल रवाँ न था
अनवर देहलवी
ग़ज़ल
मजाज़ और हक़ीक़त हैं सद्द-ए-राह-ए-जमाल
ये सब फ़रेब हैं चश्म-ए-हक़-आश्ना के लिए