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ग़ज़ल
इलाही ख़िज़्र कहूँ इश्क़ को कि ग़ोल-ए-तरीक़
कि राहबर भी ये है और सद्द-ए-राह भी है
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
'नाज़' उस के हो नहीं सकते मराहिल सद्द-ए-राह
जिस को मंज़िल तक पहुँचना है वो चलता जाएगा
नाज़ लाइलपूरी
ग़ज़ल
ग़म सद्द-ए-राह बन कर रौज़न में अड़ गए हैं
है बाँसुरी नफ़स की महरूम नग़मगी से
सईदुल हक़ सईद इटावी
ग़ज़ल
मजाज़ और हक़ीक़त हैं सद्द-ए-राह-ए-जमाल
ये सब फ़रेब हैं चश्म-ए-हक़-आश्ना के लिए
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
हो सद्द-ए-राह क्यों तेरे लिए संग-ए-वजूद अपना
तू बेबाकाना पा-ए-नाज़ उठा हम दूर होते हैं
फ़ैज़ झंझानवी
ग़ज़ल
तुझे मुबारक तिरे इरादे ये राज़ मुझ को मगर बता दे
तिरी मशिय्यत रहेगी या-रब मिरे लिए सद्द-ए-राह कब तक