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ग़ज़ल
अमानत मोहतसिब के घर शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी
तो ये समझो कि बुनियाद-ए-ख़राबात-ए-मुग़ाँ रख दी
साइल देहलवी
ग़ज़ल
ऐ ख़ुदा शिकवा नहीं 'साइल' को तेरी ज़ात से
माँ मिरी को बख़्श दे तू तुझ से है बस ये दुआ
शहज़ाद हुसैन साइल
ग़ज़ल
समो न तारों में मुझ को कि हूँ वो सैल-ए-नवा
जो ज़िंदगी के लब-ए-मो'तबर से निकलेगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
हुनर-अफ़्शानी-ए-ख़ामा को दु'आ दो कि 'फ़ज़ा'
लफ़्ज़ को सहल हुआ नाफ़ा-ए-आहू लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बुलबुल न बाज़ आइयो फ़रियाद-ओ-आह से
कब तक न होगी क़ल्ब-ए-गुल-ए-तर को इत्तिलाअ