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ग़ज़ल
दिलाओ हज़रत-ए-दिल तुम न याद-ए-ख़त्त-ए-सब्ज़ उस का
कहीं ऐसा न हो ये सम हमें भी हो तुम्हें भी हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
हवा के सायों में हिज्र और हिजरतों के वो ख़्वाब
मैं अपने दिल में वो सब मंज़िलें सजा रखता
मजीद अमजद
ग़ज़ल
मेरी बातों में भी तल्ख़ी थी सम-ए-तन्हाई की
ज़हर-ए-तन्हाई में डूबी गुफ़्तुगू उस की भी थी
ज़ुहूर नज़र
ग़ज़ल
दुश्मनों का दो ही दिन में सब भरम खुल जाएगा
उन की सारी शान-ओ-शौकत एक मेरे दम से है