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ग़ज़ल
पोशीदा लफ़्ज़ लफ़्ज़ में है दास्तान-ए-कर्ब
'क़ुदसी' किताब-ए-ज़ीस्त का हर बाब देखना
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
एहतिसाब-ए-ज़ीस्त करने के लिए बैठा था मैं
याद आई दोस्तों की कार-फ़रमाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
मेरी बातों में भी तल्ख़ी थी सम-ए-तन्हाई की
ज़हर-ए-तन्हाई में डूबी गुफ़्तुगू उस की भी थी
ज़ुहूर नज़र
ग़ज़ल
किस तरह का सम्म-ए-क़ातिल है ये शर्बत इश्क़ का
जान-ए-शीरीं ज़हर आख़िर हो गई फ़रहाद को
मोहम्मद इब्राहीम आजिज़
ग़ज़ल
किस तरह का सम्म-ए-क़ातिल है ये शर्बत इश्क़ का
जान-ए-शीरीं ज़हर आख़िर हो गई फ़रहाद को
मोहम्मद इब्राहीम आजिज़
ग़ज़ल
सम-ए-इमरोज़ से मारा हुआ हारा हुआ दिन
किसी फ़र्दा की उमीदों पे बहलती हुई रात