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ग़ज़ल
भीड़ बाज़ार-ए-समा'अत में है नग़्मों की बहुत
जिस से तुम सामने उभरो वो सदा दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
फिर नग़्मा-हा-ए-क़ुम तो फ़ज़ा में हैं गूँजते
तू ही हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-समाअत नहीं रहा