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ग़ज़ल
अगर आँखें सलामत हैं तो क्या क्या कुछ दिखाएगा
यही फैला हुआ जल्वा समा से ता-समक तेरा
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मिरी आह-ए-साइक़ा-बार जब मिरे तूर-ए-दिल पे चमक गई
जो ज़मीं से ता-ब-फ़लक गई तो फ़लक से ता-ब-समक गई
वक़ार बिजनोरी
ग़ज़ल
न होवे 'आबरू' ख़ाना-ख़राबी क्यूँ कि मर्दुम की
क्या अंझुवाँ में मेरे अब समा सीं ता-समक दरिया
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
अहमद सलमान
ग़ज़ल
एक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए
न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए