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ग़ज़ल
ये बाज़ार-ए-नफ़अ-ओ-ज़रर है यहाँ बे-तवाज़ुन न होना
समेटो अगर सूद तो ध्यान रखना ज़ियाँ खो न जाए
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
खिड़की दरवाज़े बंद करो मसनद भी समेटो ऐ लोगो
मुतरिब भी गए शमएँ भी बुझीं और ख़त्म हुआ अफ़्साना तक
अफ़ीफ़ सिराज
ग़ज़ल
इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ
दुनिया ने तुम को तन्हा किया तुम इस को तन्हा कर जाओ