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ग़ज़ल
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
उल्फ़त के नए दीवानों को किस तरह से कोई समझाए
नज़रों पे लगी है पाबंदी दीदार की बातें करते हैं
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
कहीं ऐसा न करना वस्ल का वा'दा तो करते हो
कि तुम को फिर कोई कुछ और समझाए तो रहने दो
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ज़बानों पर उलझते दोस्तों को कौन समझाए
मोहब्बत की ज़बाँ मुम्ताज़ है सारी ज़बानों में
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
सागर पार की ख़बरें देखे हम-साए का पता नहीं
आज का इंसाँ आलम फ़ाज़िल उस को अब समझाए कौन
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
कौन ये नासेह को समझाए ब-तर्ज़-ए-दिल-नशीं
इश्क़ सादिक़ हो तो ग़म भी बे-मज़ा होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
इक साथ फ़ना हो जाने से इक जश्न तो बरपा होता है
यूँ तन्हा जलना ठीक नहीं समझाए कोई परवाने को
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
होती हैं शब-ए-ग़म में यूँ दिल से मिरी बातें
जिस तरह से समझाए दीवाने को दीवाना
आग़ा हश्र काश्मीरी
ग़ज़ल
तम मेरे ख़यालों में खो कर बर्बाद न करना जीवन को
जब कोई सहेली बात तुम्हें समझाए कभी तो मत रोना
हसरत जयपुरी
ग़ज़ल
कौन सुलगते आँसू रोके आग के टुकड़े कौन चबाए
ऐ हम को समझाने वाले कोई तुझे क्यूँ कर समझाए
नरेश कुमार शाद
ग़ज़ल
हुस्न-ए-यूसुफ़ किसे कहते हैं ज़ुलेख़ा क्या है
इश्क़ इक रम्ज़ है नादाँ अभी समझा क्या है