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ग़ज़ल
हमारी गुफ़्तुगू की और भी सम्तें बहुत सी हैं
किसी का दिल दुखाने ही को फिर अपनी ज़बाँ क्यूँ हो
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
ज़मीन आँखों को मल रही थी हवा का कोई निशाँ नहीं था
तमाम सम्तें सुलग रही थीं मगर कहीं भी धुआँ नहीं था
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
मंज़िलें सम्तें बदलती जा रही हैं रोज़ ओ शब
इस भरी दुनिया में है इंसान तन्हा राह-रौ
फ़ुज़ैल जाफ़री
ग़ज़ल
सारी सम्तें आ के जिस मरकज़ पे हो जाती हैं एक
ख़म उसी जानिब हमेशा मेरी पेशानी रहे
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ग़ज़ल
पस-ए-चराग़ मैं जो सम्तें ढूँडता रहा 'तुर्क'
वो एक लफ़्ज़ के दौरान में पड़ी हुई थीं