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ग़ज़ल
सब कहते हैं देख उस को सर-ए-राह ज़मीं पर
''किस राह से आया ये उतर माह ज़मीं पर''
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
हम ने तिरी तलब में सर-ए-रह-गुज़र को देखा
हर मरहले से गुज़रे हर ख़ुश्क-ओ-तर को देखा
सैफ़ी अमरोहवी
ग़ज़ल
मुझे देख कर सर-ए-राह वो मिरे सामने से निकल गए
मुझे मुँह दिखा के छुपा लिया मिरे साथ चाल सी चल गए
कामिल चाँदपुरी
ग़ज़ल
रोज़ सर-ए-राह उस का मिलना मुमकिन है मजबूरी हो
लेकिन अब तो यूँ लगता है जैसे बहुत ज़रूरी हो
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया
मैं जब आ सका न शुमार में मुझे बे-शुमार बना दिया
इक़बाल कौसर
ग़ज़ल
सर-ए-राह कोई मुझे मिला कि नक़ाब रुख़ से उठा दिया
इक अजीब शो'ला-ए-हुस्न था दिल-ओ-जाँ में आग लगा दिया
सूफ़ी मोहम्मद तंवीर साजिद नक़्शबन्दी
ग़ज़ल
वो जिस पे तुम्हें शम-ए-सर-ए-रह का गुमाँ है
वो शो'ला-ए-आवारा हमारी ही ज़बाँ है