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ग़ज़ल
वाँ गया भी मैं तो उन की गालियों का क्या जवाब
याद थीं जितनी दुआएँ सर्फ़-ए-दरबाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग
जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मिटता है फ़ौत-ए-फ़ुर्सत-ए-हस्ती का ग़म कोई
उम्र-ए-अज़ीज़ सर्फ़-ए-इबादत ही क्यूँ न हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
इक मुद्दत से फ़ासला क़ाएम सिर्फ़ हमारे बीच ही क्यूँ
सब से मिलता रहता हूँ मैं सब से मिलता तू भी है
फ़राग़ रोहवी
ग़ज़ल
दिल को हम सर्फ-ए-वफ़ा समझे थे क्या मा'लूम था
या'नी ये पहले ही नज़्र-ए-इम्तिहाँ हो जाएगा
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बहुत निकलेंगे रोज़-ए-हश्र तेरे जौर के ख़्वाहाँ
सितम का हौसला दुनिया में सर्फ़-ए-इम्तिहाँ क्यूँ हो
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
करे है सर्फ़ ब-ईमा-ए-शो'ला क़िस्सा तमाम
ब-तर्ज़-ए-अहल-ए-फ़ना है फ़साना-ख़्वानी-ए-शमअ'
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
नतीजा कुछ नहीं है शम्अ' के आँसू बहाने से
ये सर्फ़-ए-बे-महल आशिक़ का आख़िर ख़ूँ-बहा क्यूँ हो
शौकत थानवी
ग़ज़ल
इसी उम्मीद पर सब अश्क में ने सर्फ़ कर डाले
अगर इन मोतियों में एक भी सच्चा निकल आया