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ग़ज़ल
न सफ़र ब-शर्त-ए-मआ'ल है न तलब ब-क़ैद-ए-सवाल है
फ़क़त एक सेरी-ए-ज़ौक़ को मैं भटक रहा हूँ कहाँ कहाँ
इक़बाल अज़ीम
ग़ज़ल
'नसीम' इक मो'जिज़ा है सरवर-ए-आलम का दुनिया में
अली लेटे हुए हैं और बिस्तर कुछ नहीं कहता
आफ़ताब अहमद ख़ां नसीम
ग़ज़ल
काँटे जैसी फ़ितरत होती सारे ऐसे लोगों की
मुँह के मीठे चेहरे से जो फूल सरीख़े होते हैं
देवेश दीक्षित देव
ग़ज़ल
सेरी-ए-ज़ौक़-ए-दीद को अब वो मक़ाम चाहिए
आलम-ए-होश है जहाँ आलम-ए-बे-ख़ुदी नहीं