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ग़ज़ल
धरने पे बैठने वाले पागल पिछड़ी ज़ात के थे सब
डी-एस-एल-आर वाला बस फोटो सीज़न करता था
ओसामा ज़ाकिर
ग़ज़ल
ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैं
सेजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है
सबा अफ़ग़ानी
ग़ज़ल
गर्म दो-पहरों में जलते सेहनों में झाड़ू देते थे
जिन बूढ़े हाथों से पक कर रोटी फूल में ढलती थी
हम्माद नियाज़ी
ग़ज़ल
वो होंगे और जो फूलों की सेजों पर हैं ख़्वाबीदा
हमें ऐ दूरी-ए-मंज़िल अभी काँटों पे चलना है
सअादत नज़ीर
ग़ज़ल
अगर फूलों की सेजों पर वो महव-ए-ख़्वाब रहते हैं
तो क्या काँटों के बिस्तर पर मिरी शब कट नहीं जाती