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ग़ज़ल
जो पूछें हश्र में कुछ वो तो हाँ दिला शाबाश
वहाँ भी तू यूँ ही बातें बना के रह जाना
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
ज़र्रों को शाबाश दिन को हैं हुज़ूर-ए-मेहर-ए-रुख़
देखिए छुप के निकलते हैं सितारे रात को
रशीद लखनवी
ग़ज़ल
यारो साक़ी और शराब-ओ-सब्ज़ा मौजूद आज है
'आफ़रीदी' है कबाब-ए-दिल पे जा शाबाश की
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
ग़ज़ल
ख़िज़्र को शाबाश उकताया न अब तक और हम
ज़िंदगानी एक दम भर की भी कर दूभर चले
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
ख़ुद हुस्न-ओ-शबाब उन का क्या कम है रक़ीब अपना
जब देखिए अब वो हैं आईना है शाना है