aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
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परिणाम "shab-e-vasl-e-do-aalam"
है शब-ए-वस्ल-ए-दो-आलम गेसूवो जबीं सुब्ह-ए-शहादत होगी
नक़ाब-ए-हुस्न-ए-दो-आलम उठाई जाती हैमुझी को मेरी तजल्ली दिखाई जाती है
शब-ए-वस्ल क्या मुख़्तसर हो गईज़रा आँख झपकी सहर हो गई
शब-ए-वस्ल है बहस हुज्जत अबसये शिकवे अबस ये शिकायत अबस
शब-ए-वस्ल हम मुख़्तसर देखते हैंइधर आँख झपकी सहर देखते हैं
शब-ए-वस्ल थी चाँदनी का समाँ थाबग़ल में सनम था ख़ुदा मेहरबाँ था
बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दोमुझ को दम भर के लिए ग़ैर की क़िस्मत दे दो
हौसला कोई शब-ए-वस्ल निकलने न दियादर्द-ए-दिल ने मुझे इक दम भी सँभलने न दिया
शब-ए-वस्ल ऐसी खिली चाँदनीवो घबरा के बोले सहर हो गई
शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैंये नाले बहुत मुँह लगाए गए हैं
न पूछो शब-ए-वस्ल क्या हो रहा हैगले में हैं बाँहें गिला हो रहा है
रात गुज़री कि शब-ए-वस्ल का पैग़ाम मिलासो गए ख़्वाब की बाँहों में जो आराम मिला
शब-ए-वस्ल और लब पे नफ़रत की बातेंमोहब्बत से कीजे मोहब्बत की बातें
मस्ती-ए-दो-आलम इक मरकज़ पे सिमट आईसो कर वो उठा कुछ यूँ लेता हुआ अंगड़ाई
मुंतज़िर चश्म-ए-दो-आलम है कि लम्हा भर खुलेदेखने की ताब हो तो वो रुख़-ए-अनवर खुले
तू ज़िद से शब-ए-वस्ल न आया तो हुआ क्याहम मर न गए दिल को कुढ़ाया तो हुआ क्या
हाए उस शोख़ का अंदाज़ से आना शब-ए-वस्लऔर रह रह के वो एहसान जताना शब-ए-वस्ल
शब-ए-वस्ल मेरा कुछ इसरार करनाबढ़ाना वो शर्मा के ज़ेवर किसी का
तू जो कहता है शब-ए-वस्ल में हर बार नहींहम समझते हैं ये इक़रार है इंकार नहीं
खुल गया उन की मसीहाई का आलम शब-ए-वस्लमेरा दम बंद है देते हैं मुझे दम शब-ए-वस्ल
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