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ग़ज़ल
रह-ओ-रस्म क़ल्ब ओ निगाह के वो तुम्हारे दावे निबाह के
वो हमारा शेख़ी बघारना तुम्हें याद हो कि न याद हो
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़ज़ल
शेख़ी में तो सुनता ही नहीं बात किसी की
इस दाढ़ी पर इतना भी न मग़रूर हो ऐ शैख़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
शेख़ी है वहाँ जुब्बा-ओ-दस्तार पे मौक़ूफ़
रिंदी को यहाँ तर्क-ए-तन-ओ-सर हुए मख़्सूस
साहिर देहल्वी
ग़ज़ल
जावेद जमील
ग़ज़ल
हुस्न-ए-ख़ुद-बीं जिस की फ़ितरत शेख़ी शोख़ी ज़ुल्म-ओ-जौर
दाम-ए-उल्फ़त में फँस जाए मेरी आँखों देखी बात
नज़र लखनवी
ग़ज़ल
हुए मस्तों पे गर तेग़-ए-ज़बाँ-ज़न शैख़ शेख़ी में
जो अपने नफ़्स-परवर होते मर्दाने हुए होते
वली उज़लत
ग़ज़ल
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
जुज़ मेरे दाल आप की गलती नहीं कहीं
यूँ मुँह से जितनी चाहिए शेख़ी बघारिए
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
दिला कूचे से उस के आज अगर तू ख़ैर से आया
यही दिन कल भी है दर-पेश शेख़ी से न पह पह कर