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ग़ज़ल
यक-रंग हूँ आती नहीं ख़ुश मुझ को दो-रंगी
मुनकिर सुख़न-ओ-शेर में ईहाम का हूँ मैं
मोहम्मद रफ़ी सौदा
ग़ज़ल
नाता तोड़ने वालो तुम से जंग नहीं करने के हम
तुम बैठो हम शे'ब-ए-अबी-तालिब से हो कर आते हैं
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले