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ग़ज़ल
क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को
मिरा होना बुरा क्या है नवा-संजान-ए-गुलशन को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये क्या वहशत है ऐ दीवाने पेश-अज़-मर्ग वावैला
रक्खी बे-जा बिना-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर-ए-शेवन पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़माना है कि ख़ूगर हो रहा है शोर ओ शेवन का
यहाँ वो दर्द जो बे-नाला-ओ-फ़रियाद होता है
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
ये फ़ुग़ाँ ये शोर ये नाले ये शेवन थे फ़ुज़ूल
क्या बताती थी मोहब्बत और क्या समझा था मैं
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
हर चमन दामन-ए-गुल-रंग है ख़ून-ए-दिल से
हर तरफ़ शेवन-ओ-फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ है साक़ी
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
आज़ुर्दा क्यूँ हैं अब मिरे शेवन पे अहल-ए-बाग़
कुछ दिन यहाँ पे नग़्मा-सरा भी हुआ हूँ मैं
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
ख़िज़ाँ और नग़्मे शादी के बहार आए तो गा लेना
ये दिन तो ऐ 'अनादिल हैं तुम्हारे शोर-ओ-शेवन के
रंजूर अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
बे-कसाना जी गिरफ़्तारी से शेवन में रहा
इक दिल-ए-ग़म-ख़्वार रखते थे सो गुलशन में रहा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
शेवन को कोई ख़ुल्द-ए-बरीं में ये ख़बर दे
दुनिया में अब 'अख़्तर' भी है मेहमाँ कोई दिन और