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ग़ज़ल
तय-शुदा वक़्त पर वो पहुँच जाता है प्यार करने वसूल
जिस तरह अपना क़र्ज़ा कभी कोई बनिया नहीं छोड़ता
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
तय-शुदा लफ़्ज़ों में करते हैं हम इज़हार-ए-मोहब्बत
अब तो पहले इश्क़ में भी अन-कही कम हो रही है
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
न सुहाग-रात चमक सकी यूँही कसमसाते सहर हुई
कोई दीप गुम-शुदा थालियों में जलाना हो कहीं यूँ न हो
साबिर ज़फ़र
ग़ज़ल
बोता रहता हूँ हवा में गुम-शुदा नग़्मों के बीज
वो समझते हैं कि मसरूफ़-ए-फ़ुग़ाँ रहता हूँ मैं