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ग़ज़ल
कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम
कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ
हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया
जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र
मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
अब सिवा इस के मुदावा-ए-ग़म-ए-दिल क्या है
इतनी पी जाएँ कि हर रंज-ओ-मेहन को भूलें
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
चुप है हर ज़ख़्म-ए-गुलू चुप है शहीदों का लहू
दस्त-ए-क़ातिल है जो मेहनत का सिला माँगे है
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
आफ़त-ए-जाँ उस परी से दिल लगाना हो गया
उस को क्या चाहा कि इक दुश्मन ज़माना हो गया
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
छुपा रहे न रुख़-ए-यार ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर
तक़य्या फ़र्ज़ है मोमिन को हिफ़्ज़-ए-जाँ के लिए
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
वो गर्म-ए-सर्फ़-ए-नाज़ थे वाँ बज़्म-ए-ग़ैर में
सरगर्म उस तरफ़ मिरा दिल सर्फ़-ए-जाँ में था
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
हैं अब के तेज़ जो सहरा में इस क़दर सर-ए-ख़ार
ख़ुदा ही जाने कि हैं किस बरहना-पा के लिए