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ग़ज़ल
अकेला-पन ये ख़ाली घर ये सोफ़ा मेज़ यादें ख़त
है इन से नाता आज भी भरम ज़रा सा रहने दे
गुरबीर छाबरा
ग़ज़ल
जैसे दरवाज़ा वा कर के निकला है कोई कमरे से
जैसे इक दो लम्हे गुज़रे सोफ़े पर कोई बैठा था
बिमल कृष्ण अश्क
ग़ज़ल
मोहब्बत में वफ़ाओं का यही इनआ'म है 'सूफ़ी'
लिए दाग़-ए-जुदाई हसरत-ए-नाकाम है 'सूफ़ी'
सग़ीर अहमद सूफ़ी
ग़ज़ल
रहा हो क़ुर्ब-ए-शाहाँ में सताइश के लिए बे-शक
मगर पत्थर के बुत से सिफ़त-ए-सुल्तानी नहीं जाती
सरदार पंछी
ग़ज़ल
हो नहीं सकती अना इक ख़ाकसारी से बुलंद
बोरिए में जो मसर्रत है वो सोफ़े में नहीं
मक़सूद अनवर मक़सूद
ग़ज़ल
दयार-ए-ग़ैर में हैं और यही है बूद-ओ-बाश अपनी
किसी सोफ़े पे सोते हैं मशीं से चाय पीते हैं
अशफ़ाक़ शाहीन
ग़ज़ल
सहरा सहरा घूम रहे हैं क्या क्या स्वाँग रचाए हैं
आज तुम्हारे शहर में प्यारे जोगी बन कर आए हैं