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ग़ज़ल
नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में था
यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तिराब-ए-शौक़ से
जब वो आएँ क़ब्र पर फ़ौरन जगा देना मुझे
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
बिछड़ कर तुझ से मैं शब भर न सोया कौन रोया
ब-जुज़ मेरे ये दुख भी किस ने झेला मैं अकेला
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
है तअ'ज्जुब आज तक भी इश्क़ क्यों रुस्वा नहीं
दर्द बे-आवाज़ सा है ग़म का भी साया नहीं