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ग़ज़ल
सुब्ह-ए-तरब मेरी आँखों में ख़्वाब कई लहराए थे
शाम-ए-अलम के साथी लेकिन बढ़ते फैलते साए थे
शाहिद इश्क़ी
ग़ज़ल
शाम-ए-अलम से पहले भी सुब्ह-ए-तरब के बा'द भी
शौक़-ए-तलब न मिट सका तर्क-ए-तलब के बा'द भी
मेराज लखनवी
ग़ज़ल
सुब्ह-ए-तरब को कौन पुकारे हम को है ग़म की शाम बहुत
पहरों-पहरों जब दिल तड़पे मिलता है आराम बहुत
पयाम फ़तेहपुरी
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर तो चमन में हर तरफ़ जश्न-ए-बहाराँ है
न जाने क्यों गुलों की चाक-दामानी नहीं जाती