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ग़ज़ल
ग़म-ए-जहाँ हो रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू
सुलूक जिस से किया हम ने आशिक़ाना किया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जिनाँ में साथ अपने क्यूँ न ले जाऊँगा नासेह को
सुलूक ऐसा ही मेरे साथ है हज़रत ने कर रक्खा
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
तिरे ख़ुलूस-ए-निहाँ का तो आह क्या कहना
सुलूक उचटटे भी दिल में समाए हैं क्या क्या
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
जो सुलूक करते थे और से वही अब हैं कितने ज़लील से
वो हैं तंग चर्ख़ के जौर से रहा तन पे उन के न तार है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
हक़ीक़त में जो राज़-ए-दूरी-ए-मंजिल समझते हैं
उन्हीं को हम सुलूक-ए-इश्क़ में कामिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
ख़िज़ाँ जैसे हरे पेड़ों को रुस्वा कर रही है
सुलूक ऐसा ही कुछ हम से रवा रक्खा है तुम ने
सलीम कौसर
ग़ज़ल
बद-मिज़ाज ओ बद-दिमाग़ व बद-शिआ'र ओ बद-सुलूक
बद-तरीक़ ओ बद-ज़बाँ बद-अहद ओ बद-ज़न आप हैं