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ग़ज़ल
उसे फ़स्ल फ़स्ल भी सींच कर मिला साया और न मिला समर
ये अजीब इश्क़ का पेड़ है ये अजीब शाख़-ए-निहाल है
तसनीम आबिदी
ग़ज़ल
दिल सी नौ-ख़ेज़ कली तेरी मोहब्बत के लिए
सींच के जज़्बों से पहलू में खिला के रख ली
सिदरा सहर इमरान
ग़ज़ल
दुख किसी का हो उसे धड़कन में अपनी सींच ले
किस ने सौंपा है मिरे दिल को ये पागल-पन का काम
फ़रहत शहज़ाद
ग़ज़ल
सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया
अपने लहू से सींच के हम ने मिट्टी को गुलज़ार किया
शायर लखनवी
ग़ज़ल
ख़ून-ए-दिल-ए-ग़रीब से सींच सके न जो चमन
नंग-ए-चमन है वो बशर हासिल-ए-गुलसिताँ नहीं
मुख़्तार आशिक़ी जौनपुरी
ग़ज़ल
ख़ून-ए-दिल-ओ-जिगर से इसे सींच ऐ अज़ीज़
किश्त-ए-वतन है ये कोई किश्त-ए-जवीं नहीं