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ग़ज़ल
तिरा नाम लेते ही ऐ ख़ुदा मैं सनम-कदे से निकल चुका
रहें काश ता-दर-ए-मुस्तफ़ा मिरी रहनुमा तिरी आयतें
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
ये अज़्मत रह के ज़ाहिद इन बुतों में हम ने पाई है
कि काबा हम को लेने ता-दर-ए-मय-ख़ाना आता है
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
रसाई देखिए कब ता-दर-ए-मक़्सूद होती है
नहीं जुज़ ज़ौक़-ए-सादिक़ और कोई राहबर अपना
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
ता-दर-ए-यार पहुँचता है वो ख़ुद-रफ़्ता-ए-शौक़
अपनी हस्ती से जो इस राह में बेगाना बने
बर्क़ देहलवी
ग़ज़ल
लग़्ज़िश-ए-पा ने दिया हर राह में धोका मुझे
ता-दर-ए-मंज़िल तू ही ऐ जज़्ब-ए-दिल पहुँचा मुझे
ज़िया फ़तेहाबादी
ग़ज़ल
मैं समझता था दर-ओ-बाम कहाँ बोलते हैं
फिर तिरे बा'द खुला मुझ पे कि हाँ बोलते हैं
अक़ील अब्बास चुग़ताई
ग़ज़ल
शब-ए-तन्हाई में जो सींचता था दर्द-ए-पिन्हाँ को
सजाता है बदन से अपने अब गोर-ए-ग़रीबाँ को