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ग़ज़ल
इन्हीं तारीक राहों में खड़ा है 'ताज' सदियों से
गुज़रती थी इसी रह से कोई रश्क-ए-क़मर पहले
अफ़रोज़ ताज
ग़ज़ल
कितने नादार दिल तुम ने ठुकरा दिए ये न सोचा कभी
इस मोहब्बत ने तो पा-ए-अफ़्लास पर ताज-ए-ज़र रख दिया
महशर बदायुनी
ग़ज़ल
शाह नसीर
ग़ज़ल
ऐ शम्अ एक चोर है बादी ये बाद-ए-सुब्ह
मारे है कोई दम में तिरे ताज-ए-ज़र पे हाथ