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ग़ज़ल
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
ये लोग वही हैं जो कल तक तंज़ीम-ए-चमन के दुश्मन थे
अब आज हमारे मुँह पर ये दस्तूर की बातें करते हैं
ओबैदुर रहमान
ग़ज़ल
ख़ाक ओ ख़ूँ की नई तंज़ीम में शामिल हो जाओ
ज़िंदा रहना हो तुम्हें भी तो मिरा दिल हो जाओ
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
अगर अल्लाह की वहदानियत तस्लीम करते हो
तो फिर इंसान को ख़ानों में क्यूँ तक़्सीम करते हो
महबूब राही
ग़ज़ल
नक़्स-ए-तंज़ीम से हो तर्क-ए-चमन क्या मा'नी
हम को रहना है यहीं तार-ए-रग-ए-जाँ हो कर
गुलज़ार देहलवी
ग़ज़ल
साक़ी तिरे मयख़ाने की तंज़ीम-ए-ग़लत पर
सुनते हैं कि रिंदों में है कोहराम अभी तक