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ग़ज़ल
कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी
न किसी का दामन-ए-चाक था न किसी की तर्फ़-ए-कुलाह थी
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
कोई गर सल्तनत भी दे तो वापस कर न ले ऐ दिल
सुबुक हर तर्फ़ तुझ को ग़ैर का एहसान कर देगा
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
चश्म-ए-तर है इस तरफ़ और उस तर्फ़ अब्र-ए-बहार
देखना है आज किस से कितना रोया जाए है