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ग़ज़ल
इस ख़बर से तो मिरे दिल को ख़ुशी होना थी
क्यों मुझे तर्क-ए-मुलाक़ात पे रोना आया
फ़रमान ज़ियाई सिरोजनी
ग़ज़ल
आप और तर्क-ए-मुलाक़ात ये ना-मुम्किन है
मुँह से कहते हैं मगर बात ये ना-मुम्किन है
शब्बर जीलानी क़मरी
ग़ज़ल
कल उस से हम ने तर्क-ए-मुलाक़ात की तो क्या
फिर उस बग़ैर कल न पड़ी दो घड़ी के बाद
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
क्या क्या हुईं न उन की इनायात चंद रोज़
की जिन से हम ने तर्क-ए-मुलाक़ात चंद रोज़