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ग़ज़ल
तवाफ़-ए-काबा-ओ-बुत-ख़ाना ला-हासिल समझते हैं
जो अपने दिल को हुस्न-ए-यार की मंज़िल समझते हैं
सय्यद वाजिद अली फ़र्रुख़ बनारसी
ग़ज़ल
'मुज़फ़्फ़र' ज़िंदगी में फ़र्ज़ तो इक बार था लेकिन
तवाफ़-ए-काबा-ए-दिल कर चुकी हैं बारहा आँखें
मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
ग़ज़ल
शाह नसीर
ग़ज़ल
तवाफ़-ए-का'बा बे-कैफ़िय्यत-ए-मय हो नहीं सकता
मिला लेते हैं थोड़ी सी अगर ज़मज़म भी पीते हैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
तवाफ़-ए-काबा को देख तो ले तड़प रहा है वजूद मेरा
न पाँव अब मेरे उठ रहे हैं न सामने घर वो आ रहा है
रज़िया हलीम जंग
ग़ज़ल
कर चुका 'ऐशी' तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा का क़स्द
जब तलक हिन्दोस्ताँ का मय-कदा आबाद है
तालिब अली खान ऐशी
ग़ज़ल
तवाफ़-ए-दैर-ओ-का'बा से यही हासिल हुआ मुझ को
मोहब्बत ही सरापा बंदगी मा'लूम होती है
जलील इलाहाबादी
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ख़ुदा का दोस्त है तामीर-ए-दिल जो शख़्स करता हो
ख़लीलुल्लाह भी काबा का इक मेमार था क्या था