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ग़ज़ल
थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ
मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में
बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी
थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँ बद-हवास होंगी