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ग़ज़ल
अक़्ल-ओ-होश अपने का 'रंगीं' हो गया सब और रंग
किश्वर-ए-दिल में जब आ कर इश्क़ के थाने हुए
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
ग़ज़ल
कोई है इत्तिलाअ' इस वक़्त कर दे जा के थाने पर
वो मेरे क़त्ल पर खींचे हुए तलवार बैठे हैं
ज़रीफ़ लखनवी
ग़ज़ल
सदा अम्बालवी
ग़ज़ल
सेठ साहब गिन रहे थे घर में पगड़ी के रूपे
सूँघते जाने कहाँ से थाने वाले आ गए
शाम लाल रोशन देहलवी
ग़ज़ल
यूँ पुकार है घर पर चल मुशा’एरे 'रौशन'
हाज़िरी की आवाज़ें पड़ रही हैं थाने से
शाम लाल रोशन देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
न गँवाओ नावक-ए-नीम-कश दिल-ए-रेज़ा-रेज़ा गँवा दिया
जो बचे हैं संग समेट लो तन-ए-दाग़-दाग़ लुटा दिया