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ग़ज़ल
काट गई कोहरे की चादर सर्द हवा की तेज़ी माप
उकड़ूँ बैठा इस वादी की तन्हाई में थर-थर काँप
अहसन शफ़ीक़
ग़ज़ल
फ़ुटपाथों पर रहने वाले थर-थर काँपते रहते हैं
दौलत वाले सोते हैं जब कम्बल और रज़ाई में
अहसन इमाम अहसन
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद आसमाँ जलता है आह-ए-गर्म से
काँपती है ठंडी साँसों से मिरी थर-थर ज़मीं