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ग़ज़ल
सच्चाई है अमृत धारा सच्चाई अनमोल सहारा
सच के रस्ते चल के सब ने ठोर ठिकाने पाए हैं
जमील अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
नाच उठे रक़्क़ासा-ए-जाँ धड़कनों की थाप पर
साज़ हाथों में उठाए दिल के सन्नाटों में आ
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
कसी हुई मिर्दंग सा पानी हवा की थाप से बजता है
लहर तरंग से उठती है झंकार किसी एकतारे की
ज़ेब ग़ौरी
ग़ज़ल
हक़ीक़त घोल रखता है वो रूमानों के पानी में
मनाज़िर ठोस देता है नज़र सय्याल देता है