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ग़ज़ल
मेरी गो आह से जंगल न जले ख़ुश्क तो हो
अश्क की तुफ़्त से गो जल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
दिल फ़क़्र की दौलत से मिरा इतना ग़नी है
दुनिया के ज़र-ओ-माल पे मैं तुफ़ नहीं करता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
ख़लल-अफ़गन तिरी बज़्म-ए-तरब में कौन हो ज़ालिम
हुआ क्या गर तिरे कूचे में कोई तुफ़्ता-ए-जाँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
तुफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है
इश्क़ की आतिश बला है उस की सोज़िश और है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
मैं हूँ वो तुफ़्ता-दिल की हुआ आफ़्ताब पर
मेरा गुमाँ कि आह का मेरी शरर न हो
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
ग़ज़ल
दिखाती है जो ये दुनिया वो बैठा देखता हूँ मैं
है तुफ़ मुझ पर तमाशा-बीन हो कर रह गया हूँ मैं
अरशद जमाल सारिम
ग़ज़ल
पढ़ ग़ज़ल ऐ 'ज़ौक़' कोई गर्म सी अब तो न जा
जानिब-ए-मज़मून तर्ज़-ए-तुफ़्ता-जानाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
अभी क्या सर्द क़ातिल ये शहीद-ए-तुफ़्ता-जाँ होता
कोई दम शम-ए-मुर्दा में भी है बाक़ी धुआँ होता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
मैं तो समझा था बुझावेंगे कुछ आँसू तुफ़-ए-दिल
ये तो और आग को भड़का के चले आते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
तुफ़ है उन आँखों पे जो ख़ुद में उलझ कर रह जाएँ
वो निगह क्या जो यहाँ ताके वहाँ झाँके नहीं
शमीम अब्बास
ग़ज़ल
हम ने 'रासिख़' तुझे महफ़िल में बहुत याद किया
उस ने पूछा था कोई तुफ़्ता-जिगर है कि नहीं