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ग़ज़ल
जफ़ा-ए-ग़ैर का शिकवा था तेरा था क्या ज़िक्र
अबस ये बात बुरी तुझ को बद-गुमान लगी
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मिरे जीव आरसी में ख़याल तुज मुख का सो दिस्ता है
करे ऊ ख़याल मुंज दिल में निशानी ज़र-फ़िशानी का
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
अगर ये सर्द-मेहरी तुज को आसाइश न सिखलाती
तो क्यूँकर आफ़्ताब-ए-हुस्न की गर्मी में नींद आती
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
बसंती पोश करूँ हाए रे मैं आँखों से
तू ज़ेर-ए-चश्म अगर ख़ूँ-फ़िशान से गुज़रे