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ग़ज़ल
तुलू-ए-शाम भी मुझ को नवेद-ए-सुब्ह-ए-फ़र्दा है
कहीं चमके हिलाल-ए-अबरू-ए-ख़म-दार का हल्क़ा
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
नमाज़-ए-जाम पढ़ी शैख़ ने नहीं लेकिन
'अजब सा नूर है रुख़ पर तुलू-ए-शाम के बा'द