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ग़ज़ल
देखा गया न मुझ से मआनी का क़त्ल-ए-आम
चुप-चाप मैं ही लफ़्ज़ों के लश्कर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद
शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
कहो तो हम भी चलें 'फ़ैज़' अब नहीं सर-ए-दार
वो फ़र्क़-ए-मर्तबा-ए-ख़ास-ओ-आम कहते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
वो निगाह-ए-मस्त उठी गर्दिश में जाम आ ही गया
यानी वक़्त-ए-इम्तियाज़-ए-ख़ास-ओ-आम आ ही गया
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
तूर के लुत्फ़-ए-ख़ुसूसी की क़सम पहले भी
मेरे दिल पर असर-ए-जल्वा-गह-ए-आम न था