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ग़ज़ल
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुम से वो अफ़्साने कहाँ जाते
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील'
हज़रत-ए-'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
पड़ा रह ऐ दिल-ए-वाबस्ता बेताबी से क्या हासिल
मगर फिर ताब-ए-ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
वाबस्ता है हमीं से गर जब्र है ओ गर क़द्र
मजबूर हैं तो हम हैं मुख़्तार हैं तो हम हैं
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त
और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था
ऐतबार साजिद
ग़ज़ल
है कुशाद-ए-ख़ातिर-ए-वा-बस्ता दर रहन-ए-सुख़न
था तिलिस्म-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद ख़ाना-ए-मकतब मुझे
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क्या नामे में लिक्खूँ दिल-ए-वाबस्ता का अहवाल
मालूम है पहले ही कि वो वा न करेंगे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
उस के तो नाम से वाबस्ता है कलियों का गुदाज़
आँसुओ तुम से तो पत्थर भी पिघल जाते रहे