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ग़ज़ल
हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता
तुम्हारा बन नहीं सकता हमारा हो नहीं सकता
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
सब जिसे कहते हैं वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जानाँ होना
अव्वलीं शर्त है उस के लिए इंसाँ होना
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
ज़िंदगी क्यों हुई वक़्फ़-ए-ग़म-ओ-आलाम न पूछ
मुझ से ऐ दोस्त मिरे इश्क़ का अंजाम न पूछ
मयंक अकबराबादी
ग़ज़ल
किसी के भूल जाने से मोहब्बत कम नहीं होती
मोहब्बत ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती
ग़म बिजनौरी
ग़ज़ल
अरे 'ग़म' लग़्ज़िश-ए-सोज़-ए-जिगर का कैफ़ क्या कहिए
ज़बाँ मजबूर हो जाती है जब दिल में उतरती है
ग़म बिजनौरी
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-वक़्त ने जब से मिरा घर देखा है
ज़ीस्त को वक़्फ़-ए-ग़म-ए-शाम-ओ-सहर देखा है
रहबर ताबानी दरियाबादी
ग़ज़ल
किस को था मालूम हँसता खेलता बचपन मिरा
मुफ़्लिसी की ज़द में आ के वक़्फ़-ए-ग़म हो जाएगा
शमीम फ़रहत
ग़ज़ल
दिल ही नहीं जो सोज़-ए-जुनूँ से तपाँ नहीं
क्या ज़िंदगी जो वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जावेदाँ नहीं