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ग़ज़ल
रह के महदूद-ए-वसाइल की 'मुज़फ़्फ़र' ने बसर
पाँव फैला कर कभी चादर की पैमाइश न की
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
अगर ग़ैरत है ज़िंदा तो वसाइल कीजिए पैदा
हमेशा दुम हिलाने से किसी को कुछ नहीं मिलता
इफ़्तिख़ार राग़िब
ग़ज़ल
क़हत हूँ और तिरे शहर में पड़ सकता हूँ
जितने कर सकता है मुट्ठी में वसाइल कर ले