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ग़ज़ल
इश्क़ के मैदाँ-दारों में भी मरने का है वस्फ़ बहुत
या'नी मुसीबत ऐसी उठाना कार-ए-कार-गुज़ाराँ है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़िल्क़त-ए-शहर के हर ज़ुल्म के बा-वस्फ़ 'फ़राज़'
हाए वो हाथ कि अपने ही गरेबान में है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मैं आख़िर आदमी हूँ कोई लग़्ज़िश हो ही जाती है
मगर इक वस्फ़ है मुझ में दिल-आज़ारी नहीं करता
आसी करनाली
ग़ज़ल
बा-वस्फ़-ए-ज़ब्त-ए-राज़ मोहब्बत है आश्कार
उक़्दा है दिल का अक़्द-ए-सुरय्या कहें जिसे