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ग़ज़ल
जब सुबूही ले के विर्द-ए-मर्हबा करता हूँ मैं
ज़िंदगी को नींद से चौंका दिया करता हूँ मैं
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
साथ हर साँस के आता है ज़बाँ पर तिरा नाम
दिल में जो कुछ हो वही विर्द-ए-ज़बाँ होता है
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
विर्द-ए-ज़बाँ है रोज़-ओ-शब इन की सना-ए-हुस्न
शायाँ है जिस क़दर कि ये शाएर ग़ुलू करें
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
वो सारे लोग रंज-ओ-ग़म से पा जाते हैं आज़ादी
जो सुब्ह-ओ-शाम विर्द-ए-सूरा-ए-यासीन लेते हैं
फैज़ुल अमीन फ़ैज़
ग़ज़ल
'सिराज' उस काबा-ए-जाँ के तसव्वुर कूँ किया सुमरन
यही विर्द-ए-सहर है और दुआ-ए-शाम ऐ वाइ'ज़
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
हिज्र की रातों में ये मिस्रा हुआ विर्द-ए-'सिराज'
दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
मैं तो पीता हूँ फ़क़त गुलनार होंटों की शराब
सब्बेह-इस्म-ए-रब्बेकल-आला रहे विर्द-ए-ज़बाँ
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
ग़ज़ल
मुझे कोई दिखा कर ख़्वाब में मेरा नगर बोला
यहाँ ला-हौल विर्द-ए-ख़ास रख शैतान रहते हैं