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ग़ज़ल
शरीक-ए-बुलबुल-ओ-क़ुमरी हैं वो ज़बूँ-फ़ितरत
जो बे-क़रार रहे सैर-ए-गुलसिताँ के लिए
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
शाइ'र हैं 'फ़िराक़' और भी इस दौर में लेकिन
ये रंग-ए-बयाँ रंग-ए-ज़बाँ और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बड़ी मुद्दतों में आ कर ये खुला है मुझ पे 'फ़ितरत'
कि बयान-ए-ग़म की ख़ातिर मैं ज़बान-ए-चश्म-ए-तर था
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
ग़ज़ल
दीप उल्फ़त के हर इक दिल में जलाते चलिए
हैं जो दुनिया में अंधेरे वो मिटाते चलिए
बिस्मिल्लाह अदीम
ग़ज़ल
ख़ामोश कली सारे गुलिस्ताँ की ज़बाँ है
ये तर्ज़-ए-सुख़न आबरू-ए-ख़ुश-सुख़नाँ है