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ग़ज़ल
नाज़-ए-चमन वही है बुलबुल से गो ख़िज़ाँ है
टहनी जो ज़र्द भी है सो शाख़-ए-ज़ाफ़राँ है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
मिरी तरह तो नहीं उस को 'इश्क़ का आज़ार
ये ज़र्द रहती है क्यूँ ज़ाफ़राँ नहीं मा'लूम
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
तुम्हारे नाम में क्या ज़ाफ़राँ की शाख़ है 'साइल'
कि जो सुनता है इस को उस को सुन कर मुस्कुरा देना
साइल देहलवी
ग़ज़ल
आशिक़ के रंग-ए-ज़र्द को देखो तो हँस पड़ो
तासीर उस में भी है वो जो ज़ाफ़राँ में है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
गर शाख़-ए-ज़ाफ़राँ उसे कहिए तो है रवा
है फ़रह-बख़्श वाक़ई इस हद कोहाँ बसंत
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
केसर में इस तरह से आलूदा है सरापा
सुनते थे हम सो देखा तो शाख़-ए-ज़ाफ़राँ है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
वो आख़िर केसरी मल्बूस में उर्यां निकल आए
वो खुल के अब हमारे ज़ाफ़राँ-ज़ारों से जलते हैं
बशीर दादा
ग़ज़ल
शाह नसीर
ग़ज़ल
ज़ाफ़राँ-ज़ार में लाले की बहार आ कर देख
अश्क-ए-ख़ूनीं से रुख़-ए-ज़र्द मिरा लाल है आज
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
रंग-ए-ज़र्द-ए-आशिक़ाँ कर सिर्फ़ जा-ए-ज़ाफ़राँ
इस बसंती-पोश की तस्वीर खींचा चाहिए
इश्क़ औरंगाबादी
ग़ज़ल
रंग-ए-ख़िज़ाँ भी जिस का है रश्क-ए-बहार-ए-अब्र
वो किश्त ज़ाफ़राँ की हमारे वतन में है
बिशन नरायण दराबर
ग़ज़ल
क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी