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ग़ज़ल
किसी और ग़म में इतनी ख़लिश-ए-निहाँ नहीं है
ग़म-ए-दिल मिरे रफ़ीक़ो ग़म-ए-राएगाँ नहीं है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं
ख़ुद-ब-ख़ुद फ़ासले मिट जाएँ ज़रूरी तो नहीं
ज़ाहिदा ज़ैदी
ग़ज़ल
''ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शरह-ए-आरज़ू करते''
वो ख़ुद अगर कहीं मिलता तो गुफ़्तुगू करते
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
जिन को छू कर कितने 'ज़ैदी' अपनी जान गँवा बैठे
मेरे अहद की शहनाज़ों के जिस्म बड़े ज़हरीले थे