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ग़ज़ल
ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ
कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता
अदीम हाशमी
ग़ज़ल
दिल फ़क़्र की दौलत से मिरा इतना ग़नी है
दुनिया के ज़र-ओ-माल पे मैं तुफ़ नहीं करता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
'अख़्तर' क़लम-ए-फ़िक्र के भी अश्क हैं जारी
क्या हाल लिखूँ अपने दिल-ए-ज़ार-ओ-हज़ीं का
वाजिद अली शाह अख़्तर
ग़ज़ल
'फ़ैज़' जब चाहा जो कुछ चाहा सदा माँग लिया
हाथ फैला के दिल-ए-बे-ज़र-ओ-दीनार से हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मर्द-ए-दरवेश का सरमाया है आज़ादी ओ मर्ग
है किसी और की ख़ातिर ये निसाब-ए-ज़र-ओ-सीम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सलीम कौसर
ग़ज़ल
खज़ाना-ए-ज़र-ओ-गौहर पे ख़ाक डाल के रख
हम अहल-ए-मेहर-ओ-मोहब्बत हैं दिल निकाल के रख
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
मिस्ल-ए-परवाना नहीं कुछ ज़र-ओ-माल अपने पास
हम फ़क़त तुम पे फ़िदा करने को जाँ रखते हैं
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
वालिह-ओ-शेफ़्ता ओ ज़ार-ओ-हज़ीन ओ मजनूँ
अपने आशिक़ को कल उस ने न कहा क्या क्या कुछ