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ग़ज़ल
सारी दुनिया में दाना है अपने घर में कुछ भी नहीं
ऐसा लगता है अब उस के कीसा-ए-ज़र में कुछ भी नहीं
उनवान चिश्ती
ग़ज़ल
हुए सब जम्अ' मज़मूँ 'ज़ौक़' दीवान-ए-दो-आलम के
हवास-ए-ख़मसा हैं इंसाँ के वो बंद-ए-मुख़म्मस में
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
ज़ौ-फ़िशाँ सीने में सोज़-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ निकला
दिल का हर दाग़ चराग़-ए-तह-ए-दामाँ निकला
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
अनवर अलीमी
ग़ज़ल
सूरत-ए-हाल अब तो वो नक़्श-ए-ख़याली हो गया
जो मक़ाम मा-सिवा था दिल में ख़ाली हो गया